मल्होत्रा ने कहा कि महंगाई के नतीजे अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग हैं । ज्यादातर प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं में ये टारगेट से ऊपर हैं। इससे मॉनेटरी पॉलिसी एक्शन में भिन्नता आ रही है। कारण है कि केंद्रीय बैंक अपने मौजूदा सहज साइकिलों के अंत के करीब हैं।
विशेषज्ञ कैसे डीकोड कर रहे RBI का फैसला?
एचडीएफसी बैंक की प्रिंसिपल इकोनॉमिस्ट साक्षी गुप्ता ने कहा, 'हम आगे चलकर पॉलिसी रेट पर लंबा विराम देख सकते हैं। 5.25% को टर्मिनल रेट के रूप में देखा जा सकता है। आरबीआई ने ट्रांसमिशन के लिए पर्याप्त लिक्विडिटी देने की अपनी प्रतिबद्धता को फिर से दोहराया। पिछले कुछ हफ्तों में डाली गई लिक्विडिटी को देखते हुए हमें वित्त वर्ष 2025-26 की चौथी तिमाही में और लिक्विडिटी डालने की जरूरत नहीं दिखती।'एलारा सिक्योरिटीज में इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की इकोनॉमिस्ट गरिमा कपूर ने कहा कि पहले से किए गए रेट कट के प्रभावी ट्रांसमिशन पर फोकस रखकर अर्थव्यवस्था में अच्छी ग्रोथ को देखते हुए आरबीआई की एमपीसी ने रेपो रेट को जस का तस रखने का फैसला किया। उन्होंने कहा, 'खाने की कीमतों के सामान्य होने और खराब बेस इफेक्ट के कारण महंगाई बढ़ने की आशंका है। ऐसे में आगे रेट कट की गुंजाइश कम हो गई है।'
उनके मुताबिक, 'ग्रोथ और महंगाई के बीच संतुलन में कोई झटका ही एक और रेट कट को बढ़ावा देगा। अभी के लिए हम आरबीआई से लंबे समय तक ठहराव की उम्मीद करते हैं।'
