UNSC सदस्यता की रेस में भारत के लिए फंसा पेच, मोदी की बात मानकर रेस से हटेगा मुस्लिम देश, SCO पर नजर
Updated on
31-08-2026 01:20 PM
बिश्केक: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शंघाई सहयोग संगठन (SCO) दौरा सिर्फ मध्य एशिया के साथ संबंधों तक सीमित नहीं है बल्कि इसके पीछे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भारत की बड़ी कूटनीतिक रणनीति छिपी है। वर्ष 2028-2029 के अस्थायी कार्यकाल के लिए भारत की राह में ताजिकिस्तान एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। दोनों देश एशियाई ब्लॉक की एकमात्र सीट के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। भारत और ताजिकिस्तान दोनों ही देशों ने 2028-2029 के कार्यकाल के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रखी है और ताजिकिस्तान को इस्लामिक देशों के संगठन OIC का समर्थन हासिल हो चुका है।
UNSC में पिछले एक-दो वर्षों में हुए चुनावों में जबरदस्त उलटफेर हुआ है और जर्मनी जैसे देशों को भी हार का सामना करना पड़ा है इसलिए भारत बहुत फूंक फूंककर कदम रखने की कोशिश कर रहा है। इसीलिए अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या पीएम मोदी 2009 के सफल फॉर्मूले को दोहराते हुए ताजिकिस्तान को अपनी दावेदारी पीछे हटने के लिए मना पाएंगे?
आपको बता दें कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की 2028-29 अवधि की अस्थायी सदस्यता के चुनाव जून 2027 में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में होंगे।
UNSC अस्थाई सदस्यता जीतने के लिए कितने वोट चाहिए?
अस्थाई सदस्यता हासिल करने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में मतदान करने वाले देशों का दो-तिहाई बहुमत हासिल करना अनिवार्य है।
संयुक्त राष्ट्र में कुल 193 सदस्य देश हैं। यदि सभी देश मतदान में हिस्सा लेते हैं तो भारत को जीत के लिए कम से कम 129 वोटों की आवश्यकता होगी।
ताजिकिस्तान को 57 सदस्यीय इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) का आधिकारिक समर्थन हासिल हो चुका है जो कि एक बड़ा वोट बैंक है।
भारत को अमेरिका, ऑस्ट्रिया, फिजी और श्रीलंका जैसे देशों से शुरुआती समर्थन की प्रतिबद्धता मिल चुकी है। इसके अलावा गुप्त मतदान की वजह से खाड़ी के कई देशों जैसे यूएई, कुवैत, कतर जैसे देशों का समर्थन भारत को मिल सकता है।
इसके अलावा अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों में ताजिकिस्तान की राजनयिक पहुंच भारत के मुकाबले काफी सीमित है। यहां भारत को फायदा है फिर भी 129 वोट हासिल करना आसान नहीं है। पिछली बार 2021-22 के टर्म भारत को रिकॉर्ड 184 वोट मिले थे।
इसीलिए मोदी की उज़्बेकिस्तान और किर्गिज़ गणराज्य की चार दिन की यात्रा, मध्य एशिया के दो अहम देशों या शंघाई सहयोग संगठन (SCO) तक पहुंचने की कोशिश से कहीं ज्यादा है। इस यात्रा के एजेंडे में तीन और मल्टीलेटरल (बहुपक्षीय) मंचों पर बातचीत शामिल होगी। 1- सितंबर में होने वाला ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन, 2- 2028-2029 के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का दो साल का कार्यकाल, और 3- लंबे समय से लंबित भारत-मध्य एशिया शिखर सम्मेलन की योजना बनाना जो 2022 के बाद से नहीं हुआ है।
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