भारत ने दशकों तक झेली ईकोसिस्टम में चीतों की कमी
एक समय था जब भारत के मैदानों में चीते शान से दौड़ते थे, लेकिन शिकार और सिमटते जंगलों की वजह से वे विलुप्त हो गए। दशकों तक भारत के ईकोसिस्टम में उनकी कमी खलती रही। अब इस खालीपन को भरने की कोशिश हो रही है। यह सिर्फ जानवरों को बचाने का अभियान नहीं है, बल्कि इसका बड़ा मकसद घास के मैदानों को पुनर्जीवित करना, जैव-विविधता बढ़ाना और मध्य भारत में ईको-टूरिज्म के जरिए रोजगार के नए रास्ते खोलना है।चुनौतियों भरा रहा पूरा सफर
बेशक, यह सफर चुनौतियों भरा रहा है। चीतों को एक से दूसरे महाद्वीप शिफ्ट करना दुनिया की सबसे कठिन वैज्ञानिक प्रक्रियाओं में से एक है। नए माहौल में ढलना, शिकार की तलाश और इंसानी दखल से सुरक्षा जैसी चुनौतियां आज भी सामने खड़ी हैं। इसके बावजूद, भारत की जमीन पर शावकों का जन्म लेना यह बताता है कि प्रोजेक्ट सही दिशा में है। देश में अब 38 चीते हैं और 9 शावक जन्म ले चुके हैं, जिससे एक आत्मनिर्भर और स्थायी आबादी का सपना अब हकीकत के करीब लगने लगा है।प्रोजेक्ट चीता की पूरी कहानी
1: कूनो में गामिनी नाम की मादा चीता ने दूसरी बार 3 शावकों को जन्म दिया है, जो प्रोजेक्ट की सफलता का बड़ा प्रमाण है।2: भारत में अब तक जन्मे जीवित शावकों की संख्या बढ़कर 27 हो गई है, जिससे विदेशी चीतों पर निर्भरता कम हो रही है।
3: सितंबर 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 8 चीतों को छोड़कर इस मिशन की शुरुआत की थी, जो अब एक आत्मनिर्भर आबादी की ओर बढ़ रहा है।
4: कूनो के विशेषज्ञों, डॉक्टरों और वन रक्षकों की कड़ी निगरानी के कारण शावकों के जीवित रहने की दर में सुधार हुआ है।
5: इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य न केवल चीतों को बसाना है, बल्कि भारत के घास के मैदानों को फिर से जीवित करना भी है।
